कैदी नंबर 956… ड्रग्स का काला बाजार दलदल में फंसें सितारें व युवा हजार

आजकल फिल्मी दुनिया की चकाचौंध में जल्दी ही लोकप्रियता पाने का एक नया ही दौर आरंभ हो चुका हैं। अपराध छोटा हो या बड़ा अपराध तो संवैधानिक रूप से व अपराध ही होता हैं। उस पर लगने वाली धारा और मिलने वाली सजा का प्रावधान अंतर हैं। अब फिल्मीस्तान की बातें और उनसे जुड़े कई लोगों ने ऐसी सामाजिक और आपराधिक गलतियां की हैं जिनके चलते युवाओं और उनसे किसी ना किसी रूप में अभिप्रेरित होने वाले लोग अब फिल्मीस्तान के प्रति काफी नाराज होकर फिल्मी संस्कृति से शनै:शनै: दूर होते जा रहे हैं। यह एक कड़वा सच हैं कि वालीवुड और हालीवुड में चरस,गांजा,अफीम,तमाम नशेली वस्तुओं का एक आपराधिक बाजार बनता जा रहा हैं। विशेषकर नामचीन अभिनेता और अभिनेत्रियों की औलादें तेजी से ऐसी नशेली दुष्प्रवतियों की शिकार हो रही हैं।फिर चाहे वे औरत हो या पुरुष।

भौतिकवाद की चकाचौंध में हर कोई अपने को सबसे आगे देखने में बुराईयों की राह पर तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। सुशांतसिंह के आत्महत्या के बाद से फिल्मी दुनिया में एक कहर टूट पड़ा हैं। एक के बाद एक कई हस्तियों के दबें काले बाजारों से जुड़े कारनामें उजागर होते जा रहे हैं। बदनामी के डर से कई ने तो मौत को गले लगा लिया और कई हस्तियां अभी भी सभ्यता का चोला ओड़कर अपने को समाज और शुभचिंतकों के सामने बेकसूरवार दिखाने का नाटक कर बनें फिर रहे हैं। करोड़ों कमाने वाले शाहरुख खान के पुत्र आर्यन ने चंद गलत दोस्तों की महफिल के चलते मां बाप और अपनी छवि को मिट्टी में मिला दिया। वहीं कुछ सिरफिरे फिल्म बनाने वालों ने आर्यन को रातरात का सुपर स्टार घोषित कर दिया। मंद बुध्दि के ऐसे लोगों के कारण ही आज भारतीय समाज का सामाजिक तानाबाना या तो टूट रहा हैं या बिखर कर आपराधिक प्रवृतियों का तेजी से शिकार होकर सलाखों के पीछे अपनी किस्मत को कोस रहा हैं। एक बाप यानी शाहरुख खान ने खुले तौर पर यह स्टेटमेंट दिया था कि मेरा बेटा वो सब करें जो मेने किया हैं। स्पष्ट हैं कि एक बिगडेल बाप ही यह राय दे सकता हैं। वरना भारतीय समाज में कोई भी बाप ऐसा कहने के पहले दस बार सोचेगा। आज एक बेटा उनकी ही मंशा का शिकार होकर सलाखों के पीछे अपने ही मां बाप को भी कोस रहा हैं। काश ! कुछ अच्छे संस्कार दिए होते तो आर्यन की यह हालत नहीं होती। किसी को खुली किताब के रुप में पढ़ना,समझना और सीखना हो तो संजय दत्त से कोई बड़ा उदाहरण आज फिल्मीस्तान में दूसरा कोई नहीं हैं। अभिनेता से सांसद बने परवेश रावल ने ट्यूटर पर दो टूक बहुत ही सही कहा कि गलती अगर बाप करें तो पूरा परिवार प्रभावित होता हैं और यदि बेटा या बेटी अगर कोई गलती करें तो पूरा समाज,समुदाय और नई युवा संस्कृति को उसकी सजा उठाना पड़ती हैं। आर्यन अब एक कैदी नम्बर 956 बन चुका हैं। कुछ मनचलें और बेकार बैठे डायरेक्टर,निर्माता आर्यन के इस कांड को लेकर एक फिल्म भी बना देगें। संभवत शाहरूख उसमें बेटे के कलंक को धोने के लिए सुपर स्टार बनाने के लिए निर्माता की आर्थिक मदद भी कर देगें। परन्तु उस समाज का क्या जो काले बाजार और नशीलें पदार्थों से जुड़े लोगों के खिलाफ आवाज उठाकर लाखों की जिंदगी बचाने के लिए रातदिन सड़कों पर बैनर लेकर कानून को जगाने में जुटे हुए हैं और ऐसे अपराधियों को सख्त से सख्त सजा दिलाने के लिए कमर कसें हुए हैं।

फिल्मीस्तान की संस्कृति से आहत हो रही युवा पीढ़ी : यह सत्य हैं कि हम जिन्हें अपना हीरो या रोल माडल मानते हैं वे ही यदि अपराधिक घटनाओं में लिप्त रहे हैं या अपराध को बढ़ावा देवें तो उन्हें समाज या भारतीय संस्कृति ने स्वीकार करना चाहिए या उन्हें सबक के रूप में कानून के कटघरे में खड़ा करना चाहिए। राजनीति के गलियारों में नेतागण और तमाम पार्टियों ने आवाज उठाई हैं कि भाजपा जबरन आर्यन को लेकर उप्र में चुनावी रेटी सेंकना चाहती हैं। किन्तुइन पार्टियों को आर्यन में आपराधिक बोध नजर नहीं आ रहा हैं। और भाजपा को दोषी करार दे रही हैं। देशहित में और कानून की दृष्टि से ना तो भाजपा कि कोई भूमिका हैं और ना ही गैर भाजपाईयों ने आर्यन के ड्रग्स मामले को कोई राजनीतिक रंग देने कि कोशिश करना चाहिए। क्रूज ड्रग्स केस में एनसीबी की भूमिका को शक और संदेह से ना देखते हुए दोषी को केवल एक आपराधिक रूप में देखने की सामूहिक पहल होनी चाहिए। शाहरुख खान की चुप्पी ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। केवल वकीलों के भरोसे जमानत पर अड़े हुए शाहरुख खान को कोर्ट का भी सम्मान करना चाहिए,और अपने बेटे कि आपराधिक गलतियों को भी सहज स्वीकार करना ही चाहिए। आर्यन को सुपर स्टार बताने वाले फिल्म निर्माता रामगोपाल वर्मा ने पहले भी मुम्बई हमलें पर विलासराव देफमुख की सरकार के लिए बड़े संकट पैदा कर दिए थे। बाद में देशमुख सरकार का क्या हुआ हमसबको पता हैं! सुशांतसिंह राजपूत का कानूनी परिणाम आना अभी शेष हैं। क्रूज ड्रग्स मामले को लेकर कुछ मीडिया चैनलों ने एक ही राग आर्यन का अलापना आरंभ कर रखा हैं। इन चैनलों के लिए आर्यन कोई देश का सबसे बड़ा अपराधी बन चुका हैं। वहीं राष्ट्रीय ज्वलंत मुद्दों से आम जनता का ध्यान भटकाकर आर्यन कांड या आर्यन पुराण रोज मसाले के साथ परोसा जा रहा हैं। ऐसी गंदी और पक्षपातपूर्ण वाली पत्रकारिता की भी तीव्र भर्त्सना होनी चाहिए। आर्यन ही एकमेव मुखौटा नहीं हैं। ऐसी कई बड़ी मछलियाँ फिल्मीस्तान में हैं जो नशीलें पदार्थों के काले बाजार से जुड़ी हुई हैं। उन्हें भी पकड़कर सलाखों के पीछे खड़ा करना होगा। वरना समाज की युवा पीढ़ियों को उड़ता पंजाब बनाने वाले ऐसे ड्रग्स पेडलर और ड्रग्स के कारोबारी लोग देश और समाज को खोखला करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगें।

कैदी नम्बर 956 आने वाले समय में एक फिल्म का नाम बनकर समाज की युवा पीढ़ी को और गुमराह करेगा। किसी भी व्यक्ति या राजनैतिक पार्टी के लिए सबसे पहले राष्ट्र और उसका संवैधानिक कानून सर्वोपरि हैं। लखीमपुर कांड में एक केन्द्र के मंत्री का बेटा अगर सलाखों के पीछे हैं तो आम जनता ने भी महसूस करना चाहिए कि कानून सभी के लिए समान हैं। अपराध का स्वरुप भिन्न हो सकता हैं परन्तु उसकी न्याय प्रक्रिया सभी के लिए एक समान ही हैं। आज देश के कानून के सामने सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह हैं कि हम सब गलत या आपराधिक प्रवृतियों को बढ़ाने में जुटे हुए हैं। अर्थात् हमें किसी भी अपराधियों को बचाने के बजाय उन्हें कानून प्रावधानों के तहत सुधरने और गलतियों को एक प्रायश्चित के रूप में सजा को सहज स्वीकार करना ही चाहिए। मोटी फीस लेकर वकालत करने वाले कानून के रक्षकों को भी न्याय के तराजू से पहले अपने ईमान और देश के हितों को ध्यान में रखना होगा तब कहीं हम सब एक न्यायसंगत संवैधानिक कानून के प्रति और अधिक मजबूत बन सकेगें।

डां. तेजसिंह किराड़
वरिष्ठ पत्रकार व शिक्षाविद
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