ऐतिहासिक सफ़र | घुग्घुस ग्रामपंचायत से नगरपरिषद वाया मानिकपुर…!

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“करीबन 100 साल पहले वर्धा नदी के तट पर मानिकपुर नाम का एक गांव बसा था. इस गांव में भूमिगत कोयले की खदान थी. अंग्रेजी हुकूमत के काल में यहां तक रेलवे की ट्रैक बिछाई गई. इस ट्रैक पर रेलगाड़ी दौड़ने लगी. तत्कालीन सुंदरलाल डागा जैसे बड़े उद्योगपति ने यहां निजी भूमिगत कोयले खदान शुरू की. परिसर के लोगों को धीरे धीरे अच्छा रोजगार मिलने लगा. इसी समय में मानिकपुर का नाम बदलकर घुग्घुस कर दिया गया.”

आज भी यहां पर मानिकपुर का इतिहास बताने वाले कई बोर्ड रेलवे स्टेशन, अंग्रेजो ने बनाई हुई पुरानी वास्तु और पोस्ट ऑफिस की दीवारों पर नजर आते है. घुग्घुस के साथ ही आसपास के इलाकों में भी खदाने शुरू हुई. देश स्वतंत्र होने के बाद 1960 के दशक में वेस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड कंपनी शुरू हुई. इसी काल में एसीसी सीमेंट कंपनी भी यहां आरंभ हुई. औद्योगिक उन्नति के लिए जरूरी सारी चीजें इस इलाके में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने से इस परिसर में कोयला सीमेंट और लोहा कंपनियों ने पैर पसारे। महाराष्ट्र राज्य के निर्माण के बाद से बड़ी पंचायतों की स्थापना हुई. 30 जुलाई 1962 को पहले सरपंच के रूप में रामचंद्र नगराले ने यहां पदभार संभाला।

आज 58 सालों में विभिन्न पार्टियों के 30 सरपंच सत्ता संभाल चुके हैं लेकिन दुख इस बात का है कि जिले की सबसे रईस ग्राम पंचायत होते हुए भी इस गांव का वैसा विकास कभी हो नहीं सका. आज इस गांव की खासियत यह है कि यहां पर मराठी भाषीको के साथ ही अन्य भाषिक लोग भी बड़ी संख्या में रहने लगे है. इसी लिए घुग्घुस को मिनी इंडिया भी कहा जाता है. 2011 की जनगणना के अनुसार गांव की जनसंख्या 30,000 के आसपास है. पिछले 10 वर्षों में यह संख्या 50,000 पार कर चुकी है. जनसंख्या के लिहाज से इस ग्राम पंचायत ने चाहिए वैसा विकास नहीं किया है. इसीलिए नागरिकों से लेकर जनप्रतिनिधियों तक सभी यह चाहते थे कि इस ग्राम पंचायत को नगर परिषद बना दिया जाए.

आज भी इस गांव में शिक्षा का प्रमाण 86 फ़ीसदी होने के बावजूद बेरोजगारों की संख्या 20 हजार के आसपास है. दो दशक पहले इस क्षेत्र के विधायक सुधीर मुनगंटीवार ने इस गांव को नगर परिषद का दर्जा देने की घोषणा की थी लेकिन ऐसा हो न सका. इसके बाद लंबे समय तक नगर परिषद बनाने की मांग चलती रही लेकिन यह भी कभी संभव नहीं हुआ. जिले के पालकमंत्री विजय वडेट्टीवार ने इस नगर परिषद के लिए लगातार पत्राचार किया, कोशिश की. आज चंद्रपुर शहर का उपनगर माना जाने वाला घुग्घुस शहर नगर परिषद घोषित कर दिया गया है.

कभी मानिकपुर के नाम से जाना जाने वाला यह छोटा सा गांव आज नगर परिषद बन गया है लेकिन अभी भी यहां कई ऐसी विकास की बातें करने की जरूरत है जिससे यह वाकई में किसी शहर जैसा दिखाई दे. गंभीर बीमारियों के लिए आज भी यहां अच्छे अस्पताल उपलब्ध नहीं है. सबसे ज्यादा राजस्व कमा कर देने वाला यह इलाका होकर भी यहां के रास्ते बदहाल है. नदी में रेत भरी पड़ी है लेकिन अवैध उत्खनन भी जोरों पर है. पुलिस और जिला प्रशासन की कार्रवाइयों के बावजूद रेत माफियाओं के हौसले बुलंदी पर है. जिले में शराब पर पाबंदी है लेकिन यवतमाल जिले के वणी से यहां बड़े पैमाने पर शराब पहुंचती है. यह इलाका अवैध धंधों के लिए शरणस्थली बना हुआ है. ऐसे में मानिकपुर जैसे छोटे से गांव से शुरू हुआ यह सफर अब जब नगर परिषद पर आकर रुका है तो सभी को मिलजुल कर इसे अत्याधुनिक सुविधायुक्त अच्छा शहर बनाने के लिए कोशिश भी करनी होगी।